http://kathakram.in/jan-mar13/Poetry.pdf
1. मौसम
सर्दियों की आहट सुनते ही
बुनना शुरू कर देती है
वह मेरा स्वेटर हर साल,
लपेट कर उंगलियों में
सूरज की गुनगुनी किरनें,
एक उल्टा-दो सीधा
या ऐसा ही कुछ
बुदबुदाते हुए,
हजार कामों में
फंसी-उलझी
बुन पाती है रोज इसे
बस थोड़ा ही,
पर अभी
आहिस्ता-आहिस्ता
उसकी उंगलियाँ
बिखेरना शुरू ही करती हैं
अपना जादू
कि सूरज बदल लेता है
अपना पाला
और छींटने लगता है
माथे पर पसीनें की बूंदें,
तब लटकाकर
अधबुना स्वेटर
अलने में
पोंछने लग पड़ती है
झटपट अपने पल्लू से
मेरे माथे पर उभरा
पसीना और
न्यौतती है आषाढ़
कि जुड़ा जाए मेरा
तपती गरमी से
धिका गया जी
कभी-कभी खुद ही
बरसने लगती है वह
मुझ पर
बनकर आषाढ़ भी।
2. प्रेम
चलते जाना निरंतर
चुनकर अपने-अपने
हिस्से की धरती,
एक दूसरे के विपरीत
और फिर आ खड़े होना
आमने-सामने
उन्हीं चेहरों का
नापकर
अपने-अपने
हिस्से का गोलार्ध
वे जो होते हैं
एक दूसरे के विपरीत
वही हो जाते हैं एक दिन
सम्मुख,
और तब मिलते हैं
उनके अस्तित्व
एक दूसरे में धंसे-गुंथे,
ठीक उस तरह
कि जैसे रख दिए गए हों
दो आईने
आमने-सामने,
कि जैसे रंगत में
एक दूसरे से
जुदा किरनें
एक होकर
बन जाती हैं
सूरज की सफेदी
हमारी अलग-अलग
रंगों की सोच के बावज़ूद
हमारा प्रेम भी तो है
सूरज की रोशनी सा
सफेद।
पद्मनाभ गौतम
"कथाक्रम जनवरी-मार्च 2013 अंक मे प्रकाशित दो कविताएँ
1. मौसम
सर्दियों की आहट सुनते ही
बुनना शुरू कर देती है
वह मेरा स्वेटर हर साल,
लपेट कर उंगलियों में
सूरज की गुनगुनी किरनें,
एक उल्टा-दो सीधा
या ऐसा ही कुछ
बुदबुदाते हुए,
हजार कामों में
फंसी-उलझी
बुन पाती है रोज इसे
बस थोड़ा ही,
पर अभी
आहिस्ता-आहिस्ता
उसकी उंगलियाँ
बिखेरना शुरू ही करती हैं
अपना जादू
कि सूरज बदल लेता है
अपना पाला
और छींटने लगता है
माथे पर पसीनें की बूंदें,
तब लटकाकर
अधबुना स्वेटर
अलने में
पोंछने लग पड़ती है
झटपट अपने पल्लू से
मेरे माथे पर उभरा
पसीना और
न्यौतती है आषाढ़
कि जुड़ा जाए मेरा
तपती गरमी से
धिका गया जी
कभी-कभी खुद ही
बरसने लगती है वह
मुझ पर
बनकर आषाढ़ भी।
2. प्रेम
चलते जाना निरंतर
चुनकर अपने-अपने
हिस्से की धरती,
एक दूसरे के विपरीत
और फिर आ खड़े होना
आमने-सामने
उन्हीं चेहरों का
नापकर
अपने-अपने
हिस्से का गोलार्ध
वे जो होते हैं
एक दूसरे के विपरीत
वही हो जाते हैं एक दिन
सम्मुख,
और तब मिलते हैं
उनके अस्तित्व
एक दूसरे में धंसे-गुंथे,
ठीक उस तरह
कि जैसे रख दिए गए हों
दो आईने
आमने-सामने,
कि जैसे रंगत में
एक दूसरे से
जुदा किरनें
एक होकर
बन जाती हैं
सूरज की सफेदी
हमारी अलग-अलग
रंगों की सोच के बावज़ूद
हमारा प्रेम भी तो है
सूरज की रोशनी सा
सफेद।
पद्मनाभ गौतम
"कथाक्रम जनवरी-मार्च 2013 अंक मे प्रकाशित दो कविताएँ
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