मार्गदर्शक पत्र प्रतिक्रियाएँ .........कविता से इतने वर्षों दूर रहने के बाद भी ये नहीं खोईं.......यह एक कवि के लिए सबसे बड़ी खुशी एक प्रतिक्रिया होती है ..इसलिए महत्वपूर्ण ....और तब ये पोस्ट कार्ड पर चल कर आती थीं मीलों-मील ...आज की तरह क्लिक पर सवार नहीं ...
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रजतकृष्ण , 12-01-05
प्रिय गौतम भाई,
सप्रेम नमस्कार।
अभी अभी काव्यम् का नया अंक मिला। आपकी दो बहुत प्यारी कविताएँ और संवेदनपूर्ण वक्तव्य पढ़ने को मिला। बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूँ। आपकी दोनों कविताएँ - 1.बेटियाँ 2.कस्बे की दुनिया , मुझे आपके और भी करीब ले गई। आपकी संवेदनात्मक धरातल के साथ वैचारिक धरातल की गहराई से अवगत हुआ। .....
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आपका अपना रजत
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विजय राठौर
गट्टानी स्कूल के सामने
जांजगीर, 495668 (म.प्र.)
प्रिय पद्मनाभ
असीम स्नेह
आज 'काव्यम्' में तुम्हारी कविताएँ पढ़ रहा था। 'बेटियाँ' और 'कसबे की दुनिया' अत्यंत सुंदर रचनाएँ हैं। इस लिहाज से भी कि इसमें लोक भाषा के सहज सरल शब्दों को भए स्थान मिला है। कस्बे की दैनंदिनी सहज सरल शब्दों में उतर आई है। इन कस्बों की अविकसित चेतना के लिए हम सब दोषी हैं। 52 साल की स्वतंत्रता में हम उच्चश्रृखल हुए हैं, नैतिकता हमें छू भी नहीं पाई है । खासकर मिट्टी के प्रति अपनापन बिलकुल नहीं है हममें। वैसे सच कहूँ तो तुम्हारा बयान कविता से ज्यादा गंभीर कविता है। तुम्हारे भीतर का गुस्सा, पीड़ा और समय के साथ लड़ने की छटपटाहट तुम्हारे आत्मकथ्य में एक फिल्म की तरह उतरी है। दैनिक देशबंधु की रचना की फोटो कापी भेजना। रचनाएँ अत्यंत मारक भी होती हैं , तुम्हारा निशाना ठीक लक्ष्य पर लगा हो इसलिए आपत्तियाँ सामने आईं।
बहरहाल मुखर मानसिकता के लिए बधाई। आशा है और भी बड़ी बड़ी पत्रिकाओं में तुम्हें पढ़ सकूँगा।
विजय राठौर
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रायगढ़ 13.01.05
पद्मनाभ भाई ,
नमस्कार।
आशा है स्वस्थ एवं सानंद होंगे। फोन से बात करने का प्रयास किया किन्तु तकनीकी व्यवधान के कारण संभव नहीं हो सका।
'काव्यम्' में तुम्हारी दो कविताएँ - 1 बेटियाँ 2 कस्बे की दुनिया, पढे मैंने! पसंद आई! आशा करता हूँ कुछ और अच्छी कविताएँ आगे पढ़ने को मिलेंगी। संवाद बनाए रखना।
तुम्हारा अग्रज
रमेश शर्मा 'परिधि'
गायत्री मंदिर के निकट
मालीपारा, बोरईदादर
रायगढ़ , (छ.ग.)
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ए -127 , आवास विकास कॉलोनी, शाहपुर - 237006 , दूरभाष - 0551-2284220
08-01-05
प्रिय भाई ,
काव्यम में आपकी कविताएँ पढ़ीं। 'बेटियाँ' कविता ने प्रभावित किया। वक्तव्य में 'संतयुग' पद का प्रयोग भी।
बधाई
नए साल की शुभकामनाएँ
विनम्र
देवेंद्र आर्य
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लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी
रघु ठाकुर
राष्ट्रीय अध्यक्ष दिनांक 15-11-04
प्रिय गौतम जी
अक्षरपर्व के अक्टूबर 2004 अंक में आपकी दो कविताएँ "न्याय" और "नक्सलाइट बेल्ट में" पढ़ीं। सदियों के अंधविश्वासों व मान्यताओं पर न्याय में जो प्रश्न उपस्थित किए हैं , वे अपने आप में ही उत्तर भी हैं व चेतना का संचार करने वाले भी। आदिवासी अंचलों में, चार दशकों से मैं, यथाशक्ति संगठन संघर्ष के कार्यों में लगा हूँ। तथा आदिवासी को ही यह व्यवस्था , जरा सी रियायत माँगने पर किस प्रकार नक्सल बना देती है, इसका वर्णन अद्भुत है । आपकी कविताओं को पढ़कर लगा कि आपको लिखना ही चाहिए भले ही औपचारिक परिचय न हो।
हस्ताक्षर - रघु ठाकुर
संपर्क- 27 ए,डी.डी.ए.फ्लैट्स, माता सुंदरी रोड, नई दिल्ली-2 फोन - 23239393
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लोहिया सदन, जहांगीराबाद, भोपाल, फोन - 2767249
सतत रचनात्मकता के लिए ऐसे पत्र अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं....
जवाब देंहटाएंजी भाईजी, आपकी बात बिल्कुल सही है.....और कविता से किन्ही कारणों से एक अरसे तक दूर रहने के कारण और भी अच्छे से समझ आती है..
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