एक ज़मीन, तीन शायर, तीन गज़लें - 28 March 25
बैकुंठपुर कोरिया के शायर विजय 'शान' ने एक ग़ज़ल कही. उसी ज़मीन पर ताहिर 'आज़मी' और फिर मैंने यानी पद्मनाभ 'गौतम' ने भी ग़ज़ल कही यह वाकया हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप का है. ग़ज़लें ठीक-ठाक बन पड़ीं तो इन्हें ब्लॉग में डाल रहा, जिससे दर्ज़ रहे रहे. अपने विचार प्रकट कीजिये और आप इसी ज़मीन पर ग़ज़ल कहना चाहें तो झटपट भेज दीजिये. हम उसे नीचे जोड़ देंगे.
बह्र - बह्र-ए-रमल मुसमन महफूज़
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
वज़्न - 2122/ 2122/2122/212
ग़ज़ल - 01 - विजय 'शान'
जा रहे हो उस तरफ क्या रास्ता महफूज़ है
घर हमारा जल गया है, आपका महफूज़ है
ज़िंदगी की कश्मकश में लड़ रहा था वो जहां
आंधियों की सरपरस्ती में दिया महफूज़ है
ज़िंदगी की सारी खुशियां हमने बांटी आपसे
इसलिए तो आज भी वो राब्ता महफूज़ है
हमको हैरत हो रही है क्या हुआ कैसे हुआ
पत्थरों के बीच भी इक आइना महफूज़ है
मैं हिफाजत कर रहा था दस्तखत की आपके
दिल की मेरी कोठरी में जो पता महफूज़ है
- विजय सोनी 'शान'✍️
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ग़ज़ल 02 - ताहिर 'आजमी'
ये ज़मीं महफूज़ है और आसमां महफूज़ है
सर पे अपने क्या हंसी ये सायबां महफूज़ है
दमबख़ुद सकते में हैं ये देखके मेरे हरीफ़
बर्क़ की ज़द में ये कैसे आशियाँ महफूज़ है
संग दिल से दिल लगाकर भी कभी टूटा नहीं
दिल मेरा महफूज़ है ये मेरी जां महफूज़ है
देख लो अहले नज़र मेरा ये तख्ते-दार से
जज़्बा-ए-शौक़-ए-शहादत का बयां महफूज़ है
गर ज़मीं ये तंग है जाए कहां बतला ज़रा
क्या सितारों से भी आगे का जहां महफूज़ है
कीजिए हक़ की हिमायत बोलिए कुछ तो हुज़ूर
आपके मुंह मे अगर सच्ची ज़ुबां महफूज़ है
ला मुहाला फ़िकरे मंज़िल छोड़ ताहिर आज़मी
कारवां महफूज़ मीर-ए-कारवां महफूज़ है
ताहिर आज़मीताहिर 'आज़मी'✍️
दमबखुद-आश्चर्य चकित, सकते में-शून्यता में, बर्क़ -बिजली, खामखां-बेवजह, तख्ते-दार-फांसी, सूली
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ग़ज़ल 03 - पद्मनाभ 'गौतम'
क्या नज़र की हद से आगे कारवाँ महफूज़ है
क्या ख़ला खतरे में है या कहकशाँ महफूज़ है
आग की लपटों में दुनिया जल रही है दूर ग़र
यह समझना मत तुम्हारा आशियाँ महफूज़ है
ज़ोर इन मुँहज़ोर दरियाओं का है कुछ इस क़दर
नाख़ुदा ना कश्तियाँ ना बादबाँ महफूज़ है
मर चुके हम-तुम कि अब देखेगा किसको कौन कब
इश्क अचरज है कि ज़िन्दा, मेरी जाँ महफूज़ है
यूँ तो दुश्मनियों के जाने कितने बाइस हो गए
प्यार का जादू मुहब्बत दरमियाँ महफूज़ है
हम चले जाएँगे दुनिया से मगर है यह सुकूँ
बज़्म में मौजूद थे, यह दास्ताँ महफूज़ है
- पद्मनाभ 'गौतम' ✍️
खला - अंतरिक्ष, कहकशाँ - आकाशगंगा, नाख़ुदा - जहाज़ का कप्तान, बादबाँ - नाव की पाल, बज़्म - सभाI