गुरुवार, 27 मार्च 2025

एक ज़मीन, तीन शायर, तीन गज़लें - 28 March 25

एक ज़मीन, तीन शायर, तीन गज़लें - 28 March 25


बैकुंठपुर कोरिया के शायर विजय 'शान' ने एक ग़ज़ल कही. उसी ज़मीन पर ताहिर 'आज़मी' और फिर मैंने यानी पद्मनाभ 'गौतम' ने भी  ग़ज़ल कही यह वाकया हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप का है. ग़ज़लें ठीक-ठाक बन पड़ीं तो इन्हें ब्लॉग में डाल रहा, जिससे दर्ज़ रहे रहे.  अपने विचार प्रकट कीजिये और आप इसी ज़मीन पर ग़ज़ल कहना चाहें तो झटपट भेज दीजिये. हम उसे नीचे जोड़ देंगे.

बह्र - बह्र-ए-रमल मुसमन महफूज़

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

वज़्न  - 2122/ 2122/2122/212


ग़ज़ल  - 01 - विजय 'शान'      

                                                     

जा रहे हो उस  तरफ क्या  रास्ता  महफूज़ है

घर हमारा  जल  गया है, आपका  महफूज़  है


ज़िंदगी की कश्मकश  में लड़ रहा था वो जहां

आंधियों  की  सरपरस्ती  में  दिया  महफूज़ है


ज़िंदगी  की  सारी  खुशियां हमने बांटी आपसे

इसलिए   तो   आज  भी  वो  राब्ता महफूज़ है


हमको  हैरत  हो  रही  है  क्या हुआ कैसे हुआ

पत्थरों के बीच भी इक आइना  महफूज़ है


मैं हिफाजत कर रहा था  दस्तखत की आपके

दिल की मेरी कोठरी में जो पता महफूज़ है


- विजय सोनी 'शान'✍️


                                                            ____________*****______________


ग़ज़ल 02 - ताहिर 'आजमी'


                                                            


ये ज़मीं महफूज़ है और आसमां महफूज़ है

सर पे अपने क्या हंसी ये सायबां महफूज़ है


दमबख़ुद सकते में हैं ये देखके मेरे हरीफ़

बर्क़ की ज़द में ये कैसे आशियाँ महफूज़ है


संग दिल से दिल लगाकर भी कभी टूटा नहीं

दिल मेरा महफूज़ है ये मेरी जां महफूज़ है


देख लो अहले नज़र मेरा ये तख्ते-दार से

जज़्बा-ए-शौक़-ए-शहादत का बयां महफूज़ है


गर ज़मीं ये तंग है जाए कहां बतला ज़रा

क्या सितारों से भी आगे का जहां महफूज़ है


कीजिए हक़ की हिमायत बोलिए कुछ तो हुज़ूर

आपके मुंह मे अगर सच्ची ज़ुबां महफूज़ है


ला मुहाला फ़िकरे मंज़िल छोड़ ताहिर आज़मी

कारवां महफूज़ मीर-ए-कारवां महफूज़ है


ताहिर आज़मीताहिर 'आज़मी'✍️


दमबखुद-आश्चर्य चकित, सकते में-शून्यता में, बर्क़ -बिजली, खामखां-बेवजह, तख्ते-दार-फांसी, सूली



                                           _________________***_____________________


ग़ज़ल 03 - पद्मनाभ 'गौतम'






क्या नज़र की हद से आगे कारवाँ महफूज़ है

क्या ख़ला खतरे में है या कहकशाँ महफूज़ है


आग की लपटों में दुनिया जल रही है दूर ग़र

यह समझना मत तुम्हारा आशियाँ महफूज़ है


ज़ोर इन मुँहज़ोर दरियाओं का है कुछ इस क़दर

नाख़ुदा ना कश्तियाँ ना  बादबाँ महफूज़ है


मर चुके हम-तुम कि अब देखेगा किसको कौन कब 

इश्क अचरज है कि ज़िन्दा, मेरी जाँ महफूज़ है


यूँ तो दुश्मनियों के जाने कितने बाइस हो गए

प्यार का जादू मुहब्बत दरमियाँ महफूज़ है


हम चले जाएँगे दुनिया से मगर है यह सुकूँ

बज़्म में मौजूद थे, यह दास्ताँ महफूज़ है  


 पद्मनाभ 'गौतम' ✍️


खला - अंतरिक्ष, कहकशाँ - आकाशगंगा, नाख़ुदा - जहाज़ का कप्तान, बादबाँ - नाव की पाल, बज़्म - सभाI

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

एक समकालीन ग़ज़ल

 आज एक समकालीन ग़ज़ल -

ये मौसमों के बीच में मौसम नए-नए
हैरान कर रहे हैं मरासम नए-नए
दौरे-ख़िज़ाँ है, मौसमे-गुल भी है साथ में
किस्सा-ए-मुहब्बत में पेंच-ओ-ख़म नए-नए
कुछ उनकी इनायत है, कुछ हम भी बावफ़ा
ऐसे ही क्या मिले हैं रंजो-ग़म नए-नए
दुनिया का आदमी हूँ या बाहर की कोई शै
होने लगे हैं मुझको भी वहम नए-नए
हर बात पे मुक़ाबिल, हर बात पे नाराज़
ये मेरे शहरयार हैं, रुस्तम नए-नए
चलने में साथ ठोकरें, उलझन, ये हड़बड़ी
लाज़िम है मुश्किलें ओ हमकदम नए-नए
मौसम गुलों का पीली ये सरसों नई दुल्हन
इतरा रहा पलाश ज्यों बलम नए-नए
मरासम/मरासिम - ताल्लुक, दौरे ख़िज़ाँ - पतझड़, मौसमे-गुल - वसंत ॠतु, पेंच-ओ-ख़म - जटिलताएँ, मुक़ाबिल - सामने खड़ा, शहरयार - अधिकारी/मेयर, रुस्तम - ताकतवर, वीर

सोमवार, 3 फ़रवरी 2025

आज यह ग़ज़ल आप गुणीजनों के सामने -

 आज यह ग़ज़ल आप गुणीजनों के सामने -

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भीत पर मन की ये बिरवे जड़ जमाए जा रहे
मन के आँगन ढीठ कुछ छतनार छाए जा रहे
है नई शतरंज, राजा ढाई घर, इक घर वज़ीर
ऊँट सीधे, फ़ील अब तिरछे बढ़ाए जा रहे
रात पूरी गाए मालिन, बीत जब अवसर चुके
राग सच में भोर के दुपहर सुनाए जा रहे
आ गए जंगल शहर, थक-हार कर प्रतिरोध में
युद्ध का 'हाका' किए संसद हिलाए जा रहे
यक्ष जैसे स्वप्न पूछें प्रश्न, व्याकुल सब यहाँ
लोग स्वप्नों को ही निद्रा में सुलाए जा रहे
दीप कच्ची मिट्टियों के, और यह उथली नदी
आस दीपक हैं प्रवाहित, या सिराए जा रहे?
द्वीप डूबे, अश्रुओं के ज्वार में, पर दुधमुहे
जीभ युद्धों को चिढ़ाते खिलखिलाए जा रहे
धूप सुलगी, अगन लहकी, बारिशें दूभर, मगर
ज़िद है, यह बनफूल जंगल को हँसाए जा रहे
इक उदासी का है जंगल, एक धूमिल आसमाँ
दूर से आती कोई धुन, हम भी गाए जा रहे
भीत - दीवार,
छतनार - छाते/छत की तरह फैलने वाला वृक्ष,
फ़ील - हाथी
'हाका' - न्यू-ज़ीलैंड की संसद में मूल निवासी युवा सांसद 'राना रौहिती' का युद्ध-घोष - 'माओरी हाका'
"रात पूरी गाए मालिन, बीत जब अवसर चुके" - बघेली बोली की एक लोकोक्ति से उद्धृत"
सिराना - विसर्जित करना

बुधवार, 29 जनवरी 2025

दूसरी ही मिलेगी। पहली को बचाओ।


लगातार डेढ़ बरस तक ‘रॉक मैकेनिक्स’ की किताबों में सर खपाने के बाद आज़ाद हूँ और आज निकला हूँ आवारगी के लिए, नयी सड़क पर। ऊँ..हूँ! आवारगी वह नहीं , जो आप समझे! आवारगी में मेट्रो से चावड़ी बाजार की जगह चांदनी चौक पहुँच गया, गूगल ज्ञान की दया से। कोई कहता है वापस चावड़ी जाओ। कोई कहता है, सीधे जाओ। खैर! सीधे जाना ठीक है, चांदनी चौक स्टेशन की गर्दी में दोबारा फँसने से।आगे बढ़ते ही गली में मिल गये हैं पण्डित जी। पान बेचते। मन किया तो बनवा लिया। पूछा 'मगही'है, तो कहे ʼनहीं भैया, बनारसी। मगही महँगा पड़ता हैʼ। आश्चर्य तब हुआ, जब दिया जोड़ा पान! चट पूछा ‘पण्डित जी, कहाँ से?’, तो पता चला प्रतापगढ़। अब तो बनारस और इलाहाबाद भी पान जोड़े में नहीं देते! पण्डित जी बोले - 'हम चलाते हैं'। पूछा फोटो खींच लें बनारसी पान का, तो ज़वाब मिला, बिल्कुल! अड़तीस सालों से यहीं बैठते हैं!

ख़ैर, पान खाकर आगे बढ़े तो ‘नई सड़क’ पास ही मिल गयी। तिल धरने को भी जगह नहीं। उँगलियों के पोरों को अब तांगे नहीं, ई-रिक्शा चींथते हैं और कोई नहीं लगाता हाँक - 'हट जा जीणे जोगिये'। सुनने वाले 'गुलेरी' भी अब कहाँ रहे। यहाँ से श्वेता जी के लिए बीस साल पहले महँगी साड़ी खरीदी थी, आठ सौ की! वो न उम्र में आगे बढ़ती हैं, न साड़ियों की कीमत में। आज भी वहीं टिकी हुई हैं। दोनों ही में मेरा फ़ायदा है।
बहरहाल, ‘नई सड़क’ पर वो नहीं मिली जो चाहिए। किसी ने कहा ‘महिला हाट’ जाओ। वाया अज़मेरी गेट। दो किलोमीटर तो बहुत दूर है! जिसे खोजता हूँ , वह महिला हाट में मिलेगी। अब उसने अपना पता बदल लिया है। दरियागंज से चली गयी है, कुछ आगे। भले ई-रिक्शा वाले ने कहा उसके कुछ करीब छोड़ देगा, अज़मेरी गेट छोड़ कर। रुपये उतने ही मांगे पर बख़्शीश तो बनती है। रिक्शा वाला गूगल-पे नहीं चलाता और मेरे पास छुट्टा नहीं है। आस-पास कोई छुट्टा देने वाला भी नहीं है। लो अब कर लो बात!
‘डिलाइट’ के सामने है महिला हाट। अब रास्ता खाली है। ‘डिलाइट’ में लगी है भूल-भुलैया - 3 और ग्लेडियेटर -2। दूसरी के दो शो हैं, प्राइम और पहली का केवल एक, सुबह का।
अचानक ही लगा, महिला हाट में शायद ही वो मिले।दूसरी ही मिलेगी। पहली को बचाओ।
पुनश्च- उम्मीद की किरन बाक़ी है। बहुत में इकलौती, अंतिम पंक्ति में पार्क के पीछे के चबूतरे के बगल की दुकान। विनोद कुमार शुक्ल और मज़ाज वहीं पर मिलेंगे पास-पास।

भगदड़  

क्या वह आदमी

जिसने खोया है

मक्के की भगदड़ में
अपनी माँ को
हँस सकेगा
महाकुम्भ की भगदड़ में
मरते लोगों पर
या वह, जिसने खोया है
अपना बेटा
महाकुम्भ की भगदड़ में
अब कभी हँसेगा
हज में मची भगदड़ पर
हज और महाकुम्भ में
भगदड़ के बाद
लाशें थीं एक समान मुद्राओं में
चेहरों पर अंतिम भाव
बदहवासी, भय और हताशा के
जब मचती है भगदड़
तब मरता नहीं है धर्म
मरती नहीं है कोई किताब
मरता है तो बस एक आदमी
वह अब किसी धर्म का अनुयायी नहीं
पर अब भी होता है
किसी का पिता
किसी का भाई
किसी की माँ, बहन, बेटी
किसी का आसरा
किसी की उम्मीद
मुझे नहीं पता कि
धर्मस्थलों में मरकर,
वह भी भगदड़ की
अकाल मृत्यु में,
मिलता होगा कैसा स्वर्ग
पर मैं बखूबी जानता हूँ
पिता को अकालमृत्यु में
खो देने पर
मिलने वाले नर्क को।
30/01/2025

सोमवार, 27 जनवरी 2025

ग़ज़ल


खिला यूँ ही न गुलमोहर अकेला



कहीं नींदें, कहीं बिस्तर अकेला

कोई रहता है यूँ अक्सर अकेला


नदी पर्वत से कहती है ये हँस कर

यहीं बहते हैं हम, मत डर अकेला


मुझे शक ख़ुद पे ही होने लगा अब

कि खो सकता हूँ मैं बाहर अकेला 


ये पटरी है सड़क की तख़्ते-ताऊस 

यही कह कर है ख़ुश बेघर अकेला


कगारों तक नदी पर्वत से लाई

झरा ऐसा ही क्या निर्झर अकेला


कई सपने, कई यादों के मौसम

कहा किसने कि है शायर अकेला


ख़िज़ाँ सर पे, दरख़्ते-इश्क़ है यह

खिला यूँ ही न गुलमोहर अकेला


पद्मनाभ, 27/01/2025




एक ज़मीन, तीन शायर, तीन गज़लें - 28 March 25

एक ज़मीन, तीन शायर, तीन गज़लें - 28 March 25 बैकुंठपुर कोरिया के शायर विजय 'शान' ने एक ग़ज़ल कही. उसी ज़मीन पर ताहिर 'आज़मी' और फि...